श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.8.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कौस्तुभाख्यमभूद् रत्नं पद्मरागो महोदधेः।

तस्मिन्हरिः स्पृहां चक्रे वक्षोऽलङ्करणे मणौ॥ ५

kaustubhākhyamabhūd ratnaṃ padmarāgo mahodadheḥ|

tasminhariḥ spṛhāṃ cakre vakṣo'laṅkaraṇe maṇau|| 5

अर्थ

तत्पश्चात् कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि समुद्रसे निकली। उस मणिको अपने हृदयपर धारण करनेके लिये अजितभगवान्‌ने लेना चाहा॥ ५॥✎ 708 709

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #708 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #709 शब्दोंके बीचका स्थान: अजितभगवान् ने → अजितभगवान्‌ने

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