तत्पश्चात् कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि समुद्रसे निकली। उस मणिको अपने हृदयपर धारण करनेके लिये अजितभगवान्ने लेना चाहा॥ ५॥✎ 708709
कौस्तुभाख्यमभूद् रत्नं पद्मरागो महोदधेः।
तस्मिन्हरिः स्पृहां चक्रे वक्षोऽलङ्करणे मणौ॥ ५
तत्पश्चात् कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि समुद्रसे निकली। उस मणिको अपने हृदयपर धारण करनेके लिये अजितभगवान्ने लेना चाहा॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.8.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 942) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/8/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)