वे सोचने लगे—‘कैसा अनुपम सौन्दर्य है। शरीरमेंसे कितनी अद्भुत छटा छिटक रही है! तनिक इसकी नयी उम्र तो देखो!’ बस, अब वे आपसकी लाग-डाँट भूलकर उसके पास दौड़ गये। उन लोगोंने काममोहित होकर उससे पूछा—॥ २॥
अहो रूपमहो धाम अहो अस्या नवं वयः।
इति ते तामभिद्रुत्य पप्रच्छुर्जातहृच्छयाः॥ २
वे सोचने लगे—‘कैसा अनुपम सौन्दर्य है। शरीरमेंसे कितनी अद्भुत छटा छिटक रही है! तनिक इसकी नयी उम्र तो देखो!’ बस, अब वे आपसकी लाग-डाँट भूलकर उसके पास दौड़ गये। उन लोगोंने काममोहित होकर उससे पूछा—॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 947) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/9/2/