श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तत्र श्रद्धा मनोः पत्‍नी होतारं समयाचत।

दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता॥ १४

tatra śraddhā manoḥ patnī hotāraṃ samayācata|

duhitrarthamupāgamya praṇipatya payovratā|| 14

अर्थ

यज्ञके आरम्भमें केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्‍नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो॥ १४॥

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