श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायंस्तत् सुसमाहितः।

ह२विषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन्द्विजः॥ १५

preṣito'dhvaryuṇā hotā dhyāyaṃstat susamāhitaḥ|

haviṣi vyacarat tena vaṣaṭkāraṃ gṛṇandvijaḥ|| 15

अर्थ

तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    गृहीते हविषि वाचं वष०।

    (मुद्रित पृष्ठ 8)

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