तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी॥ १५॥
प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायंस्तत् सुसमाहितः।
हविषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन्द्विजः॥ १५
तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.1.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 8) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/1/15/