‘भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है। वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये॥ १७॥
भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम्।
विपर्ययमहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया॥ १७
‘भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है। वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.1.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 8) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/1/17/