श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.24

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्‍च परमाद‍्भुतान्।

दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम्॥ २४

pragṛhya ruciraṃ cāpaṃ śarāṃśca paramādbhutān|

daṃśito'numṛgaṃ vīro jagāma diśamuttarām|| 24

अर्थ

वीर सुद्युम्‍न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत बाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये॥ २४॥

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