हाय-हाय! स्वामी! आज हम सब बेमौत मारी गयीं। एक दिन वह था, जब आपके भयसे समस्त लोकोंमें त्राहि-त्राहि मच जाती थी। आज वह दिन आ पहुँचा कि आपके न रहनेसे हमारे शत्रु लंकाकी दुर्दशा कर रहे हैं और यह प्रश्न उठ रहा है कि अब लंका किसके अधीन रहेगी॥ २६॥
हा हताः स्म वयं नाथ लोकरावण रावण।
कं यायाच्छरणं लंका त्वद्विहीना परार्दिता॥ २६
हाय-हाय! स्वामी! आज हम सब बेमौत मारी गयीं। एक दिन वह था, जब आपके भयसे समस्त लोकोंमें त्राहि-त्राहि मच जाती थी। आज वह दिन आ पहुँचा कि आपके न रहनेसे हमारे शत्रु लंकाकी दुर्दशा कर रहे हैं और यह प्रश्न उठ रहा है कि अब लंका किसके अधीन रहेगी॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 56) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/26/