श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स्वान् स्वान् बन्धून् परिष्वज्य लक्ष्मणेषुभिरर्दितान्।

रुरुदुः सुस्वरं दीना घ्नन्त्य आत्मानमात्मना॥ २५

svān svān bandhūn pariṣvajya lakṣmaṇeṣubhirarditān|

ruruduḥ susvaraṃ dīnā ghnantya ātmānamātmanā|| 25

अर्थ

उन्होंने देखा कि उनके स्वजन-सम्बन्धी लक्ष्मणजीके बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न होकर पड़े हुए हैं। वे अपने हाथों अपनी छाती पीट-पीटकर और अपने सगे-सम्बन्धियोंको हृदयसे लगा-लगाकर ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगीं॥ २५॥

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