श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.45

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

पुष्पकस्थोऽन्वितः१ स्त्रीभिः स्तूयमानश्‍च वन्दिभिः।

विरेजे भगवान् राजन् ग्रहैश्‍चन्द्र इवोदितः॥ ४५

puṣpakastho'nvitaḥ strībhiḥ stūyamānaśca vandibhiḥ|

vireje bhagavān rājan grahaiścandra ivoditaḥ|| 45

अर्थ

इन लोगोंके साथ भगवान् पुष्पक विमानपर विराजमान हो गये, चारों तरफ यथास्थान स्त्रियाँ बैठ गयीं, वन्दीजन स्तुति करने लगे। उस समय पुष्पक विमानपर भगवान् श्रीरामकी ऐसी शोभा हुई, मानो ग्रहोंके साथ चन्द्रमा उदय हो रहे हों॥ ४५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    स्थो वृतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 59)

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