॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.46
भ्रातृभिर्नन्दितः सोऽपि सोत्सवां प्राविशत् पुरीम्।
प्रविश्य राजभवनं गुरुपत्नीः२ स्वमातरम्॥ ४६
bhrātṛbhirnanditaḥ so'pi sotsavāṃ prāviśat purīm|
praviśya rājabhavanaṃ gurupatnīḥ svamātaram|| 46
अर्थ
इस प्रकार भगवान्ने भाइयोंका अभिनन्दन स्वीकार करके उनके साथ अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया। उस समय वह पुरी आनन्दोत्सवसे परिपूर्ण हो रही थी। राजमहलमें प्रवेश करके उन्होंने अपनी माता कौसल्या, अन्य माताओं, गुरुजनों, बराबरके मित्रों और छोटोंका यथायोग्य सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया हुआ सम्मान स्वीकार किया। श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीने भी भगवान्के साथ-साथ सबके प्रति यथायोग्य व्यवहार किया॥ ४६-४७॥✎ 1639
टिप्पणियाँ
- २
पत्नीं।