॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.7
जित्वानुरूपगुणशीलवयोऽङ्गरूपां
सीताभिधां श्रियमुरस्यभिलब्धमानाम्।
मार्गे व्रजन् भृगुपतेर्व्यनयत् प्ररूढं
दर्पं महीमकृत यस्त्रिरराजबीजाम्॥ ७
jitvānurūpaguṇaśīlavayo'ṅgarūpāṃ
sītābhidhāṃ śriyamurasyabhilabdhamānām|
mārge vrajan bhṛgupatervyanayat prarūḍhaṃ
darpaṃ mahīmakṛta yastrirarājabījām|| 7
अर्थ
भगवान्ने जिन्हें अपने वक्षःस्थलपर स्थान देकर सम्मानित किया है, वे श्रीलक्ष्मीजी ही सीताके नामसे जनकपुरमें अवतीर्ण हुई थीं। वे गुण, शील, अवस्था, शरीरकी गठन और सौन्दर्यमें सर्वथा भगवान् श्रीरामके अनुरूप थीं। भगवान्ने धनुष तोड़कर उन्हें प्राप्त कर लिया। अयोध्याको लौटते समय मार्गमें उन परशुरामजीसे भेंट हुई जिन्होंने इक्कीस बार पृथ्वीको राजवंशके बीजसे भी रहित कर दिया था। भगवान्ने उनके बढ़े हुए गर्वको नष्ट कर दिया॥ ७॥✎ 878