॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.10.8
यः सत्यपाशपरिवीतपितुर्निदेशं
स्त्रैणस्य चापि शिरसा जगृहे सभार्यः।
राज्यं श्रियं प्रणयिनः सुहृदो निवासं
त्यक्त्वा ययौ वनमसूनिव मुक्तसंगः॥ ८
yaḥ satyapāśaparivītapiturnideśaṃ
straiṇasya cāpi śirasā jagṛhe sabhāryaḥ|
rājyaṃ śriyaṃ praṇayinaḥ suhṛdo nivāsaṃ
tyaktvā yayau vanamasūniva muktasaṃgaḥ|| 8
अर्थ
इसके बाद पिताके वचनको सत्य करनेके लिये उन्होंने वनवास स्वीकार किया। यद्यपि महाराज दशरथने अपनी पत्नीके अधीन होकर ही उसे वैसा वचन दिया था, फिर भी वे सत्यके बन्धनमें बँध गये थे। इसलिये भगवान्ने अपने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की। उन्होंने प्राणोंके समान प्यारे राज्य, लक्ष्मी, प्रेमी, हितैषी, मित्र और महलोंको वैसे ही छोड़कर अपनी पत्नीके साथ यात्रा की, जैसे मुक्तसंग योगी प्राणोंको छोड़ देता है॥ ८॥✎ 2048