श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः३।

स्त्रीपुम्भिः सुरसंकाशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः॥ ३४

dhūpadīpaiḥ surabhibhirmaṇḍitaṃ puṣpamaṇḍanaiḥ|

strīpumbhiḥ surasaṃkāśairjuṣṭaṃ bhūṣaṇabhūṣaṇaiḥ|| 34

अर्थ

रंग-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    मण्डलैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 64)

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