श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इक्ष्वाकुके पुत्र थे निमि। उन्होंने यज्ञ आरम्भ करके महर्षि वसिष्ठको ऋत्विज्के रूपमें वरण किया। वसिष्ठजीने कहा कि ‘राजन्! इन्द्र अपने यज्ञके लिये मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं॥ १॥
निमिरिक्ष्वाकुतनयो वसिष्ठमवृतर्त्विजम्।
आरभ्य सत्रं सोऽप्याह शक्रेण प्राग्वृतोऽस्मि भोः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इक्ष्वाकुके पुत्र थे निमि। उन्होंने यज्ञ आरम्भ करके महर्षि वसिष्ठको ऋत्विज्के रूपमें वरण किया। वसिष्ठजीने कहा कि ‘राजन्! इन्द्र अपने यज्ञके लिये मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.13.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 66) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/13/1/