श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शिष्यव्यतिक्रमं वीक्ष्य निर्वर्त्य गुरुरागतः।

अशपत् पतताद् देहो निमेः पण्डितमानिनः॥ ४

śiṣyavyatikramaṃ vīkṣya nirvartya gururāgataḥ|

aśapat patatād deho nimeḥ paṇḍitamāninaḥ|| 4

अर्थ

गुरु वसिष्ठजी जब इन्द्रका यज्ञ सम्पन्‍न करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमिने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है। उस समय उन्होंने शाप दिया कि ‘निमिको अपनी विचारशीलता और पाण्डित्यका बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाय’॥ ४॥

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