श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.5

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

निमिः प्रतिददौ शापं गुरवेऽधर्मवर्तिने।

तवापि पतताद् देहो लोभाद् धर्ममजानतः॥ ५

nimiḥ pratidadau śāpaṃ gurave'dharmavartine|

tavāpi patatād deho lobhād dharmamajānataḥ|| 5

अर्थ

निमिकी दृष्टिमें गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था। इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि ‘आपने लोभवश अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाय’॥ ५॥

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