श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इत्युत्ससर्ज स्वं देहं निमिरध्यात्मकोविदः।

मित्रावरुणयोर्जज्ञे उर्वश्यां प्रपितामहः॥ ६

ityutsasarja svaṃ dehaṃ nimiradhyātmakovidaḥ|

mitrāvaruṇayorjajñe urvaśyāṃ prapitāmahaḥ|| 6

अर्थ

यह कहकर आत्मविद्यामें निपुण निमिने अपने शरीरका त्याग कर दिया। परीक्षित्! इधर हमारे वृद्ध प्रपितामह वसिष्ठजीने भी अपना शरीर त्यागकर मित्रावरुणके द्वारा उर्वशीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया॥ ६॥

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