उर्वशीने कहा—‘राजन्! आप सौन्दर्यके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आपमें आसक्त न हो जाय? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमणकी इच्छासे अपना धैर्य खो बैठा है॥ २०॥
कस्यास्त्वयि न सज्जेत मनो दृष्टिश्च सुन्दर।
यदंगान्तरमासाद्य च्यवते ह रिरंसया॥ २०
उर्वशीने कहा—‘राजन्! आप सौन्दर्यके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आपमें आसक्त न हो जाय? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमणकी इच्छासे अपना धैर्य खो बैठा है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.14.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 71) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/14/20/