श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.32

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यो रातो देवयजने देवैर्गाधिषु तापसः।

देवरात इति ख्यातः शुनःशेपः स भार्गवः॥ ३२

yo rāto devayajane devairgādhiṣu tāpasaḥ|

devarāta iti khyātaḥ śunaḥśepaḥ sa bhārgavaḥ|| 32

अर्थ

यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्‍चन्द्रके यज्ञमें यज्ञपशुके रूपमें मोल लेकर लाया गया था। विश्‍वामित्रजीने प्रजापति वरुण आदि देवताओंकी स्तुति करके उसे पाशबन्धनसे छुड़ा लिया था। देवताओंके यज्ञमें यही शुनःशेप देवताओंद्वारा विश्‍वामित्रजीको दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंशमें यह तपस्वी देवरातके नामसे विख्यात हुआ॥ ३१-३२॥

यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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