श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठाः कुशलं मेनिरे न तत्।

अशपत् तान्मुनिः क्रुद्धो म्लेच्छा भवत दुर्जनाः॥ ३३

ye madhucchandaso jyeṣṭhāḥ kuśalaṃ menire na tat|

aśapat tānmuniḥ kruddho mlecchā bhavata durjanāḥ|| 33

अर्थ

विश्‍वामित्रजीके पुत्रोंमें जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेपको बड़ा भाई माननेकी बात अच्छी न लगी। इसपर विश्‍वामित्रजीने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘दुष्टो! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ’॥ ३३॥

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