॥ श्रीहरिः ॥
पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणाद् द्विजैः।
प्रापितेऽजगरत्वं वै ययातिरभवन्नृपः॥ ३
pitari bhraṃśite sthānādindrāṇyā dharṣaṇād dvijaiḥ|
prāpite'jagaratvaṃ vai yayātirabhavannṛpaḥ|| 3
अर्थ
जब इन्द्रपत्नी शचीसे सहवास करनेकी चेष्टा करनेके कारण नहुषको ब्राह्मणोंने इन्द्रपदसे गिरा दिया और अजगर बना दिया, तब राजाके पदपर ययाति बैठे॥ ३॥
पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणाद् द्विजैः।
प्रापितेऽजगरत्वं वै ययातिरभवन्नृपः॥ ३
जब इन्द्रपत्नी शचीसे सहवास करनेकी चेष्टा करनेके कारण नहुषको ब्राह्मणोंने इन्द्रपदसे गिरा दिया और अजगर बना दिया, तब राजाके पदपर ययाति बैठे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 86) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/3/