श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.32

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

राजपुत्र्यार्थितोऽपत्ये धर्मं चावेक्ष्य धर्मवित्।

स्मरञ्छुक्रवचः काले दिष्टमेवाभ्यपद्यत॥ ३२

rājaputryārthito'patye dharmaṃ cāvekṣya dharmavit|

smarañchukravacaḥ kāle diṣṭamevābhyapadyata|| 32

अर्थ

शर्मिष्ठाकी पुत्रके लिये प्रार्थना धर्मसंगत है—यह देखकर धर्मज्ञ राजा ययातिने शुक्राचार्यकी बात याद रहनेपर भी यही निश्‍चय किया कि समयपर प्रारब्धके अनुसार जो होना होगा, हो जायगा॥ ३२॥

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