श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.37

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ययातिरुवाच

अतृप्तोऽस्म्यद्य कामानां ब्रह्मन् दुहितरि स्म ते।

व्यत्यस्यतां यथाकामं वयसा योऽभिधास्यति॥ ३७

atṛpto'smyadya kāmānāṃ brahman duhitari sma te|

vyatyasyatāṃ yathākāmaṃ vayasā yo'bhidhāsyati|| 37

अर्थ

ययातिने कहा—‘ब्रह्मन्! आपकी पुत्रीके साथ विषय-भोग करते-करते अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शापसे तो आपकी पुत्रीका भी अनिष्ट ही है।’ इसपर शुक्राचार्यजीने कहा—‘अच्छा जाओ; जो प्रसन्‍नतासे तुम्हें अपनी जवानी दे दे, उससे अपना बुढ़ापा बदल लो’॥ ३७॥✎ 880

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #880 शब्दोंके बीचका स्थान: अनिष्टही → अनिष्ट ही

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