श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.38

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इति लब्धव्यवस्थानः पुत्रं ज्येष्ठमवोचत।

यदो तात प्रतीच्छेमां जरां देहि निजं वयः॥ ३८

iti labdhavyavasthānaḥ putraṃ jyeṣṭhamavocata|

yado tāta pratīcchemāṃ jarāṃ dehi nijaṃ vayaḥ|| 38

अर्थ

शुक्राचार्यजीने जब ऐसी व्यवस्था दे दी, तब अपनी राजधानीमें आकर ययातिने अपने बड़े पुत्र यदुसे कहा—‘बेटा! तुम अपनी जवानी मुझे दे दो और अपने नानाका दिया हुआ यह बुढ़ापा तुम स्वीकार कर लो। क्योंकि मेरे प्यारे पुत्र! मैं अभी विषयोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। इसलिये तुम्हारी आयु लेकर मैं कुछ वर्षोंतक और आनन्द भोगूँगा’॥ ३८-३९॥✎ 880

यह अर्थ श्लोक 38–39 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #880 शब्दोंके बीचका स्थान: अनिष्टही → अनिष्ट ही

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