श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया॥ १॥✎ 1644
स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मनः।
बुद्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 92) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)