श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.13

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।

न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते॥ १३

yat pṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ|

na duhyanti manaḥprītiṃ puṃsaḥ kāmahatasya te|| 13

अर्थ

‘प्रिये! पृथ्वीमें जितने भी धान्य (चावल, जौ आदि), सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं—वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है॥ १३॥✎ 1645

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1645 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (भोग-वासना) → (भोगवासना)

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