श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ १४

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati|

haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate|| 14

अर्थ

विषयोंके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगवासनाएँ भी भोगोंसे प्रबल हो जाती हैं॥ १४॥✎ 1645

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1645 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (भोग-वासना) → (भोगवासना)

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