श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

पंचपंचाशता मेध्यैर्गंगायामनु वाजिभिः।

मामतेयं पुरोधाय यमुनायामनु प्रभुः॥ २५

paṃcapaṃcāśatā medhyairgaṃgāyāmanu vājibhiḥ|

māmateyaṃ purodhāya yamunāyāmanu prabhuḥ|| 25

अर्थ

भरतने ममताके पुत्र दीर्घतमा मुनिको पुरोहित बनाकर गंगातटपर गंगासागरसे लेकर गंगोत्री-पर्यन्त पचपन पवित्र अश्‍वमेध यज्ञ किये। और इसी प्रकार यमुनातटपर भी प्रयागसे लेकर यमुनोत्रीतक उन्होंने अठहत्तर अश्‍वमेध यज्ञ किये। इन सभी यज्ञोंमें उन्होंने अपार धनराशिका दान किया था। दुष्यन्तकुमार भरतका यज्ञीय अग्‍निस्थापन बड़े ही उत्तम गुणवाले स्थानमें किया गया था। उस स्थानमें भरतने इतनी गौएँ दान दी थीं कि एक हजार ब्राह्मणोंमें प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक बद्व (१३०८४) गौएँ मिली थीं॥ २५-२६॥✎ 1647

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1647 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पद-पर → पदपर

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