श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.27

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

त्रयस्त्रिंशच्छतं ह्यश्‍वान् बद‍्ध्वा विस्मापयन् नृपान्।

दौष्यन्तिरत्यगान्मायां देवानां गुरुमाययौ॥ २७

trayastriṃśacchataṃ hyaśvān baddhvā vismāpayan nṛpān|

dauṣyantiratyagānmāyāṃ devānāṃ gurumāyayau|| 27

अर्थ

इस प्रकार राजा भरतने उन यज्ञोंमें एक सौ तैंतीस (५५+७८) घोड़े बाँधकर (१३३ यज्ञ करके) समस्त नरपतियोंको असीम आश्‍चर्यमें डाल दिया। इन यज्ञोंके द्वारा इस लोकमें तो राजा भरतको परम यश मिला ही, अन्तमें उन्होंने मायापर भी विजय प्राप्त की और देवताओंके परमगुरु भगवान् श्रीहरिको प्राप्त कर लिया॥ २७॥✎ 1647

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1647 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पद-पर → पदपर

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