भरतने जो महान् कर्म किया, वह न तो पहले कोई राजा कर सका था और न तो आगे ही कोई कर सकेगा। क्या कभी कोई हाथसे स्वर्गको छू सकता है?॥ २९॥✎ 1647
भरतस्य महत् कर्म न पूर्वे नापरे नृपाः।
नैवापुर्नैव प्राप्स्यन्ति बाहुभ्यां त्रिदिवं यथा॥ २९
भरतने जो महान् कर्म किया, वह न तो पहले कोई राजा कर सका था और न तो आगे ही कोई कर सकेगा। क्या कभी कोई हाथसे स्वर्गको छू सकता है?॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.20.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 98) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/20/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)