श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

स सम्राड् लोकपालाख्यमैश्‍वर्यमधिराट् श्रियम्।

चक्रं चास्खलितं प्राणान् मृषेत्युपरराम ह॥ ३३

sa samrāḍ lokapālākhyamaiśvaryamadhirāṭ śriyam|

cakraṃ cāskhalitaṃ prāṇān mṛṣetyupararāma ha|| 33

अर्थ

अन्तमें सार्वभौम सम्राट् भरतने यही निश्‍चय किया कि लोकपालोंको भी चकित कर देनेवाला ऐश्‍वर्य, सार्वभौम सम्पत्ति, अखण्ड शासन और यह जीवन भी मिथ्या ही है। यह निश्‍चय करके वे संसारसे उदासीन हो गये॥ ३३॥✎ 1647

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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