अन्तमें सार्वभौम सम्राट् भरतने यही निश्चय किया कि लोकपालोंको भी चकित कर देनेवाला ऐश्वर्य, सार्वभौम सम्पत्ति, अखण्ड शासन और यह जीवन भी मिथ्या ही है। यह निश्चय करके वे संसारसे उदासीन हो गये॥ ३३॥✎ 1647
स सम्राड् लोकपालाख्यमैश्वर्यमधिराट् श्रियम्।
चक्रं चास्खलितं प्राणान् मृषेत्युपरराम ह॥ ३३
अन्तमें सार्वभौम सम्राट् भरतने यही निश्चय किया कि लोकपालोंको भी चकित कर देनेवाला ऐश्वर्य, सार्वभौम सम्पत्ति, अखण्ड शासन और यह जीवन भी मिथ्या ही है। यह निश्चय करके वे संसारसे उदासीन हो गये॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.20.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 98) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/20/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)