श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.38

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

मूढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पते।

यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम्॥ ३८

mūḍhe bhara dvājamimaṃ bhara dvājaṃ bṛhaspate|

yātau yaduktvā pitarau bharadvājastatastvayam|| 38

अर्थ

बृहस्पतिजी कहते हैं कि ‘अरी मूढे! यह मेरा औरस और मेरे भाईका क्षेत्रज—इस प्रकार दोनोंका पुत्र (द्वाज) है; इसलिये तू डर मत, इसका भरण-पोषण कर (भर)।’ इसपर ममताने कहा—‘बृहस्पते! यह मेरे पतिका नहीं, हम दोनोंका ही पुत्र है; इसलिये तुम्हीं इसका भरण-पोषण करो।’ इस प्रकार आपसमें विवाद करते हुए माता-पिता दोनों ही इसको छोड़कर चले गये। इसलिये इस लड़केका नाम ‘भरद्वाज’ हुआ॥ ३८॥✎ 1648

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1648 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरुद्-गणोंने → मरुद्गणोंने

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