श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.39

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम्।

व्यसृजन् मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये॥ ३९

codyamānā surairevaṃ matvā vitathamātmajam|

vyasṛjan maruto'bibhran datto'yaṃ vitathe'nvaye|| 39

अर्थ

देवताओंके द्वारा नामका ऐसा निर्वचन होनेपर भी ममताने यही समझा कि मेरा यह पुत्र वितथ अर्थात् अन्यायसे पैदा हुआ है। अतः उसने उस बच्चेको छोड़ दिया। अब मरुद्गणोंने उसका पालन किया और जब राजा भरतका वंश नष्ट होने लगा, तब उसे लाकर उनको दे दिया। यही वितथ (भरद्वाज) भरतका दत्तक पुत्र हुआ॥ ३९॥✎ 1648

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे विंशोऽध्यायः॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1648 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरुद्-गणोंने → मरुद्गणोंने

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