श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.20.8

नवम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

दुष्यन्तो मृगयां यातः कण्वाश्रमपदं गतः।

तत्रासीनां स्वप्रभया मण्डयन्तीं रमामिव॥ ८

duṣyanto mṛgayāṃ yātaḥ kaṇvāśramapadaṃ gataḥ|

tatrāsīnāṃ svaprabhayā maṇḍayantīṃ ramāmiva|| 8

अर्थ

एक बार दुष्यन्त वनमें अपने कुछ सैनिकोंके साथ शिकार खेलनेके लिये गये हुए थे। उधर ही वे कण्व मुनिके आश्रमपर जा पहुँचे। उस आश्रमपर देवमायाके समान मनोहर एक स्त्री बैठी हुई थी। उसकी लक्ष्मीके समान अंगकान्तिसे वह आश्रम जगमगा रहा था। उस सुन्दरीको देखते ही दुष्यन्त मोहित हो गये और उससे बातचीत करने लगे॥ ८-९॥✎ 1646

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1646 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जग-मगा → जगमगा

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