श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.12

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

न कामयेऽहं गतिमीश्‍वरात् परा-

मष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा।

आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजा-

मन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः॥ १२

na kāmaye'haṃ gatimīśvarāt parā-

maṣṭarddhiyuktāmapunarbhavaṃ vā|

ārtiṃ prapadye'khiladehabhājā-

mantaḥsthito yena bhavantyaduḥkhāḥ|| 12

अर्थ

‘मैं भगवान्‌से आठों सिद्धियोंसे युक्त परम गति नहीं चाहता। और तो क्या, मैं मोक्षकी भी कामना नहीं करता। मैं चाहता हूँ तो केवल यही कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हो जाऊँ और उनका सारा दुःख मैं ही सहन करूँ, जिससे और किसी भी प्राणीको दुःख न हो॥ १२॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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