श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.13

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

क्षुत्तृट्श्रमो गात्रपरिश्रमश्‍च

दैन्यं क्लमः शोकविषादमोहाः।

सर्वे निवृत्ताः कृपणस्य जन्तो-

र्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे ॥ १३

kṣuttṛṭśramo gātrapariśramaśca

dainyaṃ klamaḥ śokaviṣādamohāḥ|

sarve nivṛttāḥ kṛpaṇasya janto-

rjijīviṣorjīvajalārpaṇānme || 13

अर्थ

यह दीन प्राणी जल पी करके जीना चाहता था। जल दे देनेसे इसके जीवनकी रक्षा हो गयी। अब मेरी भूख-प्यासकी पीड़ा, शरीरकी शिथिलता, दीनता, ग्लानि, शोक, विषाद और मोह—ये सब-के-सब जाते रहे। मैं सुखी हो गया’॥ १३॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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