॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.21.13
क्षुत्तृट्श्रमो गात्रपरिश्रमश्च
दैन्यं क्लमः शोकविषादमोहाः।
सर्वे निवृत्ताः कृपणस्य जन्तो-
र्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे ॥ १३
kṣuttṛṭśramo gātrapariśramaśca
dainyaṃ klamaḥ śokaviṣādamohāḥ|
sarve nivṛttāḥ kṛpaṇasya janto-
rjijīviṣorjīvajalārpaṇānme || 13
अर्थ
यह दीन प्राणी जल पी करके जीना चाहता था। जल दे देनेसे इसके जीवनकी रक्षा हो गयी। अब मेरी भूख-प्यासकी पीड़ा, शरीरकी शिथिलता, दीनता, ग्लानि, शोक, विषाद और मोह—ये सब-के-सब जाते रहे। मैं सुखी हो गया’॥ १३॥✎ 881