श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

इति प्रभाष्य पानीयं म्रियमाणः पिपासया।

पुल्कसायाददाद्धीरो निसर्गकरुणो नृपः॥ १४

iti prabhāṣya pānīyaṃ mriyamāṇaḥ pipāsayā|

pulkasāyādadāddhīro nisargakaruṇo nṛpaḥ|| 14

अर्थ

इस प्रकार कहकर रन्तिदेवने वह बचा हुआ जल भी उस चाण्डालको दे दिया। यद्यपि जलके बिना वे स्वयं मर रहे थे, फिर भी स्वभावसे ही उनका हृदय इतना करुणापूर्ण था कि वे अपनेको रोक न सके। उनके धैर्यकी भी कोई सीमा है?॥ १४॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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