श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

ईश्‍वरालम्बनं चित्तं कुर्वतोऽनन्यराधसः।

माया गुणमयी राजन् स्वप्नवत् प्रत्यलीयत॥ १७

īśvarālambanaṃ cittaṃ kurvato'nanyarādhasaḥ|

māyā guṇamayī rājan svapnavat pratyalīyata|| 17

अर्थ

परीक्षित्! उन्हें भगवान्‌के सिवा और किसी भी वस्तुकी इच्छा तो थी नहीं, उन्होंने अपने मनको पूर्णरूपसे भगवान्‌में लगा दिया। इसलिये त्रिगुणमयी माया जागनेपर स्वप्न-दृश्यके समान नष्ट हो गयी॥ १७॥✎ 881

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #881 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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