रन्तिदेव आकाशके समान बिना उद्योगके ही दैववश प्राप्त वस्तुका उपभोग करते और दिनोंदिन उनकी पूँजी घटती जाती। जो कुछ मिल जाता उसे भी दे डालते और स्वयं भूखे रहते। वे संग्रह-परिग्रह, ममतासे रहित तथा बड़े धैर्यशाली थे और अपने कुटुम्बके साथ दुःख भोग रहे थे॥ ३॥
वियद्वित्तस्य ददतो लब्धं लब्धं बुभुक्षतः।
निष्किंचनस्य धीरस्य सकुटुम्बस्य सीदतः॥ ३
रन्तिदेव आकाशके समान बिना उद्योगके ही दैववश प्राप्त वस्तुका उपभोग करते और दिनोंदिन उनकी पूँजी घटती जाती। जो कुछ मिल जाता उसे भी दे डालते और स्वयं भूखे रहते। वे संग्रह-परिग्रह, ममतासे रहित तथा बड़े धैर्यशाली थे और अपने कुटुम्बके साथ दुःख भोग रहे थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 100) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/3/