श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

व्यतीयुरष्टचत्वारिंशदहान्यपिबतः किल।

घृतपायससंयावं तोयं प्रातरुपस्थितम्॥ ४

vyatīyuraṣṭacatvāriṃśadahānyapibataḥ kila|

ghṛtapāyasasaṃyāvaṃ toyaṃ prātarupasthitam|| 4

अर्थ

एक बार तो लगातार अड़तालीस दिन ऐसे बीत गये कि उन्हें पानीतक पीनेको न मिला। उनचासवें दिन प्रातःकाल ही उन्हें कुछ घी, खीर, हलवा और जल मिला॥ ४॥

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