उनका परिवार बड़े संकटमें था। भूख और प्यासके मारे वे लोग काँप रहे थे। परन्तु ज्यों ही उन लोगोंने भोजन करना चाहा, त्यों ही एक ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ गया॥ ५॥
कृच्छ्रप्राप्तकुटुम्बस्य क्षुत्तृड्भ्यां जातवेपथोः।
अतिथिर्ब्राह्मणः काले भोक्तुकामस्य चागमत्॥ ५
उनका परिवार बड़े संकटमें था। भूख और प्यासके मारे वे लोग काँप रहे थे। परन्तु ज्यों ही उन लोगोंने भोजन करना चाहा, त्यों ही एक ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ गया॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 100) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1138 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अतिथिर्ब्ह्मण: → अतिथिर्ब्राह्मणः