श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.21.35

नवम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तस्य सत्यधृतिः पुत्रो धनुर्वेदविशारदः।

शरद्वांस्तत्सुतो यस्मादुर्वशीदर्शनात् किल॥ ३५

tasya satyadhṛtiḥ putro dhanurvedaviśāradaḥ|

śaradvāṃstatsuto yasmādurvaśīdarśanāt kila|| 35

अर्थ

शतानन्दका पुत्र सत्यधृति था, वह धनुर्विद्यामें अत्यन्त निपुण था। सत्यधृतिके पुत्रका नाम था शरद्वान्। एक दिन उर्वशीको देखनेसे शरद्वान्का वीर्य मूँजके झाड़पर गिर पड़ा, उससे एक शुभ लक्षणवाले पुत्र और पुत्रीका जन्म हुआ। महाराज शन्तनुकी उसपर दृष्टि पड़ गयी, क्योंकि वे उधर शिकार खेलनेके लिये गये हुए थे। उन्होंने दयावश दोनोंको उठा लिया। उनमें जो पुत्र था, उसका नाम कृपाचार्य हुआ और जो कन्या थी, उसका नाम हुआ कृपी। यही कृपी द्रोणाचार्यकी पत्‍नी हुई॥ ३५-३६॥

यह अर्थ श्लोक 35–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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