श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.22.47

नवम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सुनक्षत्रः सुनक्षत्राद् बृहत्सेनोऽथ कर्मजित्।

ततः सृतंजयाद् विप्रः शुचिस्तस्य भविष्यति॥ ४७

sunakṣatraḥ sunakṣatrād bṛhatseno'tha karmajit|

tataḥ sṛtaṃjayād vipraḥ śucistasya bhaviṣyati|| 47

अर्थ

निरमित्रके सुनक्षत्र, सुनक्षत्रके बृहत्सेन, बृहत्सेनके कर्मजित्, कर्मजित्के सृतंजय, सृतंजयके विप्र और विप्रके पुत्रका नाम होगा शुचि॥ ४७॥

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