इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया॥ २५॥✎ 1632
हन्तुं तमाददे वज्रं सद्योमन्युरमर्षितः।
सवज्रं स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्य भार्गवः॥ २५
इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 17) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)