दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको बेध दिया। इससे उनमेंसे बहुत-सा खून बह चला॥ ४॥✎ 1631
ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै।
अविध्यन्मुग्धभावेन सुस्रावासृक् ततो बहु॥ ४
दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको बेध दिया। इससे उनमेंसे बहुत-सा खून बह चला॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 15) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)