श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

वासुदेवे भगवति तद्भक्तेषु च साधुषु।

प्राप्तो भावं परं विश्‍वं येनेदं लोष्टवत् स्मृतम्॥ १७

vāsudeve bhagavati tadbhakteṣu ca sādhuṣu|

prāpto bhāvaṃ paraṃ viśvaṃ yenedaṃ loṣṭavat smṛtam|| 17

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णमें और उनके प्रेमी साधुओंमें उनका परम प्रेम था। उस प्रेमके प्राप्त हो जानेपर तो यह सारा विश्‍व और इसकी समस्त सम्पत्तियाँ मिट्टीके ढेलेके समान जान पड़ती हैं॥ १७॥

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