श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.18

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो-

र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने।

करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु

श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये॥ १८

sa vai manaḥ kṛṣṇapadāravindayo-

rvacāṃsi vaikuṇṭhaguṇānuvarṇane|

karau harermandiramārjanādiṣu

śrutiṃ cakārācyutasatkathodaye|| 18

अर्थ

उन्होंने अपने मनको श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दयुगलमें, वाणीको भगवद्गुणानुवर्णनमें, हाथोंको श्रीहरि-मन्दिरके मार्जन-सेचनमें और अपने कानोंको भगवान् अच्युतकी मंगलमयी कथाके श्रवणमें लगा रखा था॥ १८॥

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