श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

समर्द्धयन्ति तान् कामाः स्वाराज्यपरिभा२विताः।✎ 1128

दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यतः३॥ २५

samarddhayanti tān kāmāḥ svārājyaparibhāvitāḥ|

durlabhā nāpi siddhānāṃ mukundaṃ hṛdi paśyataḥ|| 25

अर्थ

वे अपने हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीहरिका नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन लोगोंको वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धोंको भी दुर्लभ है। वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्दके सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    वेष्टिताः।

    (मुद्रित पृष्ठ 21)
  2. ३

    पश्यताम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 21)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1128 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वाराज्यपरिभी → स्वाराज्यपरिभा

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