दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातटसे लौट आये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है॥ ४२॥
दुर्वासा यमुनाकूलात् कृतावश्यक आगतः।
राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया॥ ४२
दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातटसे लौट आये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 23) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/42/