यह चक्र उन विश्वेश्वरका शस्त्र है। यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मंगल करेंगे’॥ ५९॥
तस्य विश्वेश्वरस्येदं शस्त्रं दुर्विषहं हि नः।
तमेव शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति॥ ५९
यह चक्र उन विश्वेश्वरका शस्त्र है। यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मंगल करेंगे’॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 26) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/59/